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शिक्षक के कर्तव्य

educationशिक्षक समाज के आधार स्तंभ हैं जिनके मार्गदर्शन द्वारा भावी पीढ़ी कर्तव्यों का सफलतापूर्वक निवर्हन कर सकेगी. इस बात को सोचते हुए मन में शिक्षक का स्थान बहुत ऊंचा हो जाता है। शिक्षक के बारे में किसी के मुंह से निकली एक बुरी बात भी नासूर बनकर कलेजे में चुभती रहती है. किन्तु सोचने का विषय यह भी है कि क्या वर्तमान शिक्षक इस सम्मान के अधिकारी हैं? क्या ट्यूशन के नाम पर रुपया ऐंठने और छल करने वाले इस सम्मान के अधिकारी हैं? क्या शिक्षक के नाम को कलंकित करने वाले इस सम्मान के अधिकारी हैं? निश्चित रुप से आप निराश हो उठेंगे और कहेंगे... ‘नहीं’....... फिर आप अब सोच क्या रहे हैं, क्या इस समस्या से उबरने का कोई उपाय नहीं.

उपाय है दोस्तो! आज हमें आवश्यकता है ऐसे महापुरुषों की जो अपने आप में आदर्श हों. आज हमें आवश्यकता है ऐसे अध्यापकों की जो अपनी गरिमा को बनाये रखने के लिए किसी भी संकट का सामना कर जायें. कैसी भी परिस्थिति क्यों न आ जाये अपने कर्तव्य पर डटे रहें. समाज को आज ऐसे शिक्षकों की आवश्यकता है जो दुनियावी चकाचौंध से दूर सिर्फ अपने कर्तव्यपालन में रत हों.

विद्यार्थी जीवन एक कठिन तपस्या है जिसे प्रत्येक शिक्षक पार कर के आया है किन्तु शिक्षक को यह कदापि नहीं सोचना चाहिए कि उसकी परीक्षा समाप्त हुई बल्कि असल परीक्षाएं तो अब होनी हैं जब तुम्हारे शिष्य समाज में कदम रखेंगे और कदम-कदम पर तुम्हारे द्वारा किया गया मार्गदर्शन उनके और समाज के लिए हितकर साबित होगा.

विद्यार्थी शिक्षक का आईना है. विद्यार्थी के कार्य शिक्षक की काबिलियत का बखान करते हैं. शिक्षक को मर्यादाशील होना चाहिए. अपना व्यवहार सदैव नम्र रखना चाहिए. शिक्षक की भाषा में जितनी मृदुता होगी समाज में उसके उतने ही प्रशंसक बढ़ेंगे. शिक्षक में सहनशीलता का गुण अति आवश्यक होता है. सहनशीलता विद्यार्थियों को समाज के सुनियोजित एवं सुरक्षात्मक निर्माण का संदेश देती है.

शिक्षकों का कर्तव्य है कि विद्यार्थियों को ऐसा ज्ञान प्रदान करें जो उनके जीवन को सार्थक रुप प्रदान करे.

वर्तमान शिक्षक प्रणाली और खासकर शिक्षकों में जो दोष पनप गये हैं हमें उन्हें दूर करना होगा. समाज को एक नई दिशा देनी है. आज भी जाने कितने बच्चे शिक्षक की क्रूरता के कारण पढ़ाई छोड़ देते हैं. शिक्षक की क्रूरता के कारण संयोगवश उचित ज्ञान से दूर रहे जाते हैं.

आज जरुरत है शिक्षक और शिक्षार्थी के बीच की खाई को पाटने की ताकि प्रत्येक विद्यार्थी शिक्षक से वह ज्ञान प्राप्त कर सकें जो उसके मन को झकझोर रहा है अथवा जिज्ञासा को शांत करके उन्नति के मार्ग पर अग्रसर हो सके.

विद्यार्थी जीवन चुनौतियों का घर है. समस्याओं का अंबार है, जहां हर पल केवल देनी होती है परीक्षा. बालकों से ज्यादा बोझ बालिकाओं पर पड़ता है. चूंकि समाज की चुभती नजरें और घर के सैकड़ों काम व नसीहतें उन्हें दबे-पिसे रहने पर मजबूर कर देती हैं.

आज हमें जरुरत है ऐसी शिक्षिकाओं की जो बालिकाओं की समस्या का प्रेमपूर्वक समाधान कर सकें. किन्तु प्राय: यह देखा जाता है कि शिक्षिकांए तो बालिकाओं पर ज्यादा क्रूर साबित होती हैं. ऐसे में गर्ल्स स्कूल देखने में आते हैं जिनका नाम सुनकर भी बालिकाएं थर्राती हैं. ये कठोर नियम उनके समुचित विकास को रोक देते हैं. उन्हें दूसरी प्रकार सोचने पर मजबूर कर देते हैं.

यदि शिक्षक अपने कर्तव्य का पालन करना जानता होगा तो सदैव शिक्षार्थी का मार्गदर्शन करता रहेगा. शिक्षक का कर्तव्य है कि वह शिक्षार्थियों को ऐसा ज्ञान प्रदान करे जो उनके लिए उम्र के प्रत्येक पड़ाव पर कामयाब हो, उन्हें हर दोष, हर बुराई से दूर रहने की प्रेरणा से परिपूर्ण हो.

समाज के आयाम बदल रहे हैं. छोटी उम्र से ही बच्चों में गंदी हरकतें और बुरी आदतें पनपती जा रही हैं. शिक्षकों का कर्तव्य है कि वे उनके माता-पिता को इस बात के लिए उकसायें कि वे अपने लाडलों को गंदे माहौल से दूर रखें. उन्हें सुधारने के लिए पहले खुद को सुधारना होगा. और हमें ये खूब जान लेना चाहिए कि बच्चे हमारा ही अनुसरण करते हैं. यदि हमें भावी पीढ़ी को सुधारना है तो पहले खुद सुधरना होगा.

-Furkan Shah


1 टिप्पणियाँ

  1. Pallavi says:

    आपकी बातों से सहमत हूँ मगर अफसोस इसी बात का है की अब ऐसे शिक्षा मिलते ही नहीं सार्थक आलेख......http://mhare-anubhav.blogspot.com/ समय मिले कभी तो आयेगा मेरी इस पोस्ट पर आपका स्वागत है

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