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उद्दंड बच्चे

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प्राइमरी स्कूल में मैंने ज्यादा कुछ सीखा नहीं, लेकिन स्कूल का मुंह अवश्य देख लिया था। मेरी उम्र उस समय पांच साल की थी जब मुझे गजरौला के सेंट मैरीज कान्वेंट स्कूल में भर्ती कराया गया। यहां का माहौल बिल्कुल अलग था। सब कुछ व्यवस्थित था और शानदार भी। स्कूल तब आठवीं कक्षा तक ही था। आज की तरह विशाल भवन नहीं था। जहां तक मुझे याद है, किसी कक्षा की श्रेणियां भी नहीं थीं। आज तो वहां बहुत कुछ बदल गया है। स्कूल की इमारत इतनी भव्य बन चुकी है कि ऐसी आपको दूर-दूर तक नहीं मिलेगी। स्कूल का अनुशासन आज भी वैसा ही है जैसा पहले था।

सभी कक्षायें उस समय एक ही सीध में थीं। हम टिन की छत के नीचे पढ़ते थे, नीचे नहीं बल्कि अब मैंने कुर्सी पर बैठकर पढ़ना सीख लिया था। जहां गांव के प्राइमरी में मैदान मिट्टी-धूल से सना था, यहां वह सब नहीं था। बरसात में कक्षा में बैठकर पढ़ने में एक अलग की तरह की अनुभूति होती थी। टिप-टिप गिरता पानी अच्छा लगता था। छत चूंकि टिन शेड था, इसलिये उसमें ऐसे कई छिद्र रह गये थे जिनमें से पानी टपकता था। वह मात्र छीटें ही होता था।

कक्षा में लगी खिड़की बाहर का दृश्य दिखाती थी। पास से कच्चा रास्ता गुजर रहा था। स्कूल नाईपुरा में स्थित है। उस रास्ते से आवाजाही रहती थी, कोई बैल-गाड़ी से चारा ले लेकर जा रहा होता तो, किसी साईकिल वाले को गुजरता देख हमारी कक्षा के कुछ शरारती तत्व आवाज लगाने लगते। बच्चे थे आखिर समय मिलते ही अपना बचपना दर्शा देते थे। मैं उन्हें ध्यान से देखा करता था। खिड़कियों में सरिये लगे थे, बिल्कुल हमारे गांव के प्राइमरी स्कूल की तरह। गिनती में कुल सात-आठ ही और उनपर एक मजबूत जाली। कई कक्षाओं में जाली की हालत बेहद खराब थी, तो कुछ में सरियों की गिनती मात्र दो-तीन ही रह गयी थी। ऐसे लगता था मानों उनके साथ ज्यादती की गयी हो। उन्हें मोड़ने की भी कोशिश की गयी थी। कुछ बच्चों में शर्त लग गयी कि कौन उस सरिये को निकाल सकता है। कईयों ने पूरे जोर लगाये, नहीं निकला। सभी बच्चे इतने व्यस्त थे कि उन्हें पीछे से आने वाले शिक्षक का पता नहीं चला। फिर अचानक कहीं से ‘चटाक’ की ध्वनि सुनाई दी। देखते ही देखते खिड़की के पास कोई बच्चा ही नहीं था। सबको मालूम था कि अगली बार यह बच्चे अब अपनी ताकत इस खिड़की पर तो कभी दिखायेंगे नहीं।

बाहदुरी का दौर अब कक्षा से समाप्त हो कर आधी छुट्टी के समय होने लगा। इंटरवेल होते ही वही उद्दंड बच्चे अब कक्षा में न रहकर बाहर मैदान में दूसरे बच्चों को तंग करते या फिर अपने गुट बनाकर आपस में ही मारधाड़ करते। उनकी संख्या मुझे याद नहीं लेकिन लगभग वे कोई आठ-दस थे, जिन्हें पढ़ने में कोई विशेष रुचि नहीं थी। हमारी सभी की कक्षा एक ही थी, इसलिये आपस में मेलजोल भी थोड़ा बहुत रहता होगा। मगर कई बच्चे उनसे इतने परेशान रहते कि उन्होंने कई बार अपने माता-पिता से उनकी शिकायत की। मगर हल नहीं निकल सका। मुझे उनसे कोई खतरा नहीं था क्योंकि उनसे मेरी जान पहचान एक ऐसे बच्चे के रुप में हुयी जिसने उनसे न ज्यादा बात की और न ही अधिक मेलजोल रखा। इसके अलावा इतना जरुर हुआ कि कभी-कभार उनकी कला की कापियों में एक अच्छे सहपाठी की तरह सहायता अवश्य की। मैं चित्र बना लेता था, बिना ज्यादा जतन किये।

प्राइमरी स्कूल में भी ऐसे ही कुछ बच्चे मिले थे जो काफी उद्दंड हुआ करते थे। उनका मैदान अपना था और वे उसपर बहुत ठिठोली करते थे। यहां के मास्टर जी डंडी का प्रयोग कभी कभार करते थे, जबकि प्राइमरी में प्रायः बच्चों के माता-पिता उनके निशानों को देख कर यही कहा करते थे,‘‘शैतानी करता है, आज फिर तेरी पिटाई हुयी।’’ इसके बाद उनकी घर में काफी पिटाई बजती। इससे वे काफी झल्लाये रहते। उनका मन और भी व्यथित हो जाता। लेकिन बाल मनोविज्ञान को समझने वाले न वहां मास्टर थे और न ही बच्चों के अभागे माता-पिता। वह अभागे इसलिये थे कि वे अपनी अनपढ़ता के कारण अपने बच्चे को समझने में असमर्थ थे, जिसका खामियाजा खुद उनके खून को ही बाद में भुगतना पड़ेगा। इस तरह ऐसी दशा कभी-कभी एक कभी न खत्म होने वाले चक्र का रुप धारण कर लेती है। संयोग से आज मेरे गांव के प्राइमरी स्कूल में बच्चे कम उद्दंड हैं, वे कम पिटते हैं, उनकी पीठ पर निशानों की संख्या कम होती जा रही है, शायद वे अब खुद भी समझदार होते जा रहे हैं। साथ ही उनके माता-पिता भी उस चक्र ही सीमा में रहना नहीं चाहते जो भविष्य के लिये कष्टकारी हो। इतना जरुर हो गया कि गांव और कस्बा तथा कस्बा और शहर का अंतर जमीन आसान का है। इस अंतर को कम होता हम देख रहे हैं।

स्कूल से घर जाने की ललक बच्चे में बहुत होती है। इसी वजह से वह रोज सुबह जल्दी तैयार होता है घर से स्कूल जाने को, स्कूल से घर आने को। नर्सरी में मुझे काफी परेशानी होती थी स्कूल जाने में लेकिन क्या करें स्कूल तो जाना था। धीरे-धीरे अभ्यस्त भी हो गया। कुछ बच्चे शरारती मिले जिन्हें मैंने बड़े ध्यान से देखा और मुझे इस बात का एहसास भी होता है कि उनकी शरारतों से ही मेरा मन स्कूल में लगने लगा। मैंने उन्हें उठापटक करते देखा और मैंने यह आशा की कि कल क्या नया कारनामा करेंगे ये उद्दंड बच्चे।

(in the pic : Prabhat) for more pics of Prabhat log on : http://pga18.blogspot.com

-Harminder Singh




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